समुन्दर के किनारे खड़े , थके , निराश खम्बे को,
हर डूबती शाम का सलाम मिलता है
वो अधूरी सी हँसी से हर ऱोज मुस्कुरा कर मिलता है
कोई पहचान का सिलसिला लगता है
कुछ पंछियों का ठिकाना भी यही आस पास ही है,
उनका आना जाना भी खम्बे के तारों पर होता है
उसको सुकून है की कोई चहल पहल आस पास है
पुराने दोस्तों का आना जाना भी यहाँ रहता है
कभी देर से ही सही जब चाँद खिलखिलाता है
समुन्दर में उसका अक्स भी सुहाना लगता है
वो ऱोज ख़ामोशी से यही सोचता है
की ये शाम का अफराना भी पुराना लगता है
डूबती हुई शाम का हर कश मशगूल और बेगाना लगता है